Wednesday, February 26, 2014

अमीर....

फाइव स्टार फैसिलिटी से लैश ऑफिस से,
मीडिया कवरेज से बचता बचाता,
मर्सिडीज की रॉयल सवारी लेकर,
जब वो घर वापस लौटा,

तो,

लोगों के सपनों में आने वाले,
इस शख्स के पास,
सपने नहीं हैं देखने को ।।

आलिशान महल तो है,
लेकिन,
सुकून नहीं है, झोपड़ी जैसा भी ।।

खाने में कई लजीज चीजें तो हैं,
लेकिन,
स्वाद नहीं है, माँ के खाने जैसा ।।

आरामदायक बिस्तर तो हैं,
लेकिन,
नींद नहीं है, फुटपाथ जैसी भी ।।

तब लगा कि,
दुनिया की नजरों में,
अमीर समझा जाने वाला,
ये आदमी,
आज भी गरीब ही है शायद ।।  

Tuesday, August 13, 2013

मछली जल की रानी है....



बचपन में एक कविता तो सुनी ही होगी आपने कि "मछली जल की रानी है।" और फिर एक कहावत कि "एक मछली सारे तालाब को गन्दा करती है।"

बचपन से ही एक प्रश्न मेरे मन में अठखेलियाँ कर रहा था, कि आखिर "एक रानी अपने ही राज्य को गन्दा क्यों करेगी?" 

पहले तो लगा कि "नहीं" इन दोनों में से एक बात तो गलत ही है, लेकिन फिर बड़े बुजुर्गों की accuracy याद आ गयी कि वो जो कहते हैं सही ही होता है। और फिर, बचपन में वाद-विवाद करना उचित भी नहीं होता है और न ही उचित समझा जाता है। इसलिए यह प्रश्न भी बचपन के उन्हीं 'मासूम' प्रश्नों की तरह ओझल हो गया, जैसे कि "जब रेलगाड़ी चल रही होती है तो सारे पेड़ पीछे क्यों भागने लगते हैं ?" या फिर "इतनी बड़ी रेलगाड़ी वापस आने के लिए घूमती कैसे है?" वैसे यह दूसरा प्रश्न कई बार बड़ों के मन में भी आ जाता है, उम्मीद है कि आपके मन में नहीं आया होगा और मान लीजिये आ भी गया तो क्या हुआ आखिर 'दिल तो बच्चा ही है जी'। 

बाल मन में तर्क और वितर्क की इतनी क्षमता नहीं होती है, और न ही इस पचड़े में पड़ने का कोई औचित्य ही । परन्तु आज देश की वर्तमान स्थिति उर्फ़ "दुर्दशा" देख कर यह प्रश्न फिर से एक बार दिमाग में कौंधा और कौंधा क्या ,यों कह लीजिये कि Hence Proved हो गया।  

यदि मछली = मैडम जी, और जल = भारत मान लिया जाये, तो मुझे नहीं लगता आपको hint भी देने की जरुरत है और ज्यादा explain मैं इसलिए नहीं कर रहा कि शायद कहीं लोकतंत्र के किसी भाग की, या फिर किसी मंत्री के सम्मान की अवहेलना न हो जाये। फिर भी चलते चलते एक और कहावत जरुर बोलना चाहूँगा कि ये हमेशा याद रखियेगा कि "जल ही जीवन है" ।।  

Saturday, January 8, 2011

वो बीते पल ............


आज इस उन्मुक्त गगन में, आजाद पंक्षी को कभी जो देखता हूँ।
तो सोचता हूँ....................

आ गया हूँ मैं कहाँ, आजाद हूँ क्या मैं यहाँ।
क्या ये मेरा लक्ष्य था, आ रुका हूँ मैं जहाँ।
इस तरह के प्रश्न कुछ , आवाज़ देते हर घड़ी,
सोचता हूँ जब कभी, है याद आती वो कड़ी॥

जब रोज सपने थे बदलते, हर शाम को सूरज के ढलते।
तब हर घड़ी थी खुशनुमा, जब हम सभी थे साथ चलते।
इस छद्म सावन की चमक में, आ गए हैं हम कहाँ,
उस घड़ी पतझड़ को भी, सावन में थे हम बदलते॥

रात के दो-दो बजे, चाय की वो चुस्कियां।
बारिश में आकर भीगना, और सर्दियों की सिसकियाँ।
प्यार होता है क्या, ये शायद न तब थे जानते,
पर प्यार होता हर घड़ी, और दिल था सबसे इश्किया॥

हर बार बस पेपर से पहले, रात में पढ़ना सभी का।
और फिर पढ़ने के वादे, टूटना उनका कभी का।
हर शाम को वो बेतुकी बातें ही, शायद जिंदिगी थी,
सोचा था न हमने कभी, यूँ बिखरना जिंदिगी का॥

वो सुकून के चार पल, फिर से हम पाएंगे कैसे।
जब बहुत लगते थे हमको, पॉकेट मनी के चार पैसे।
लोग क्या समझेंगे, ये तो लोग ही जाने मगर,
धुन में अपनी ही थे हम, और हरकतें बच्चों की जैसे॥

कॉलेज के वो दिन, जो कभी न लौट के आयेंगे अब।
वो हँसी, वो जिंदिगी, रह गयी यादों में बस।
ताश के वो पत्ते , जो बिखरे पड़े हैं फर्श पर,
देखते हैं राह, कि कब लौट कर आयेंगे सब ॥

Tuesday, May 11, 2010

''माँ''........


'माँ',
लग रहा होगा तुम्हे ये शब्द छोटा सा मगर,
मैं क्या करूँ,
इस शब्द की आगोश में ही तो ,
छिपा है जग ये सारा।
देखा तो था मैंने,
कुछ और शब्दों को, मगर,
मैं क्या करूँ,
ये शब्द ही मुझको मिला,
जो संसार में है सबसे प्यारा॥

जब रो रहा था मैं कभी,
तन्हाई के आगोश में,
आँचल मिला माँ का मुझे,
सिमटा था जिसमे जग ये सारा॥

बहका अगर मैं जब कभी,
इन रास्तों की ठोकरों से,
तब अंगुली दिखी माँ की मुझे,
बन के मेरा, बस एक सहारा॥

थक हार कर बैठा था मैं जब,
संसार की इन उलझनों से,
विश्वास उसने ही भरा,
जो छू सकूँ आकाश सारा॥

जीवन था मेरा एक कोरा कागज,
माँ, जो तुम न होती साथ में,
तुमने ही तो चलना सिखाया,
दी तुमने ही वक्तव्य धारा ॥

Wednesday, January 13, 2010

चलो जो आज शब्दों को, इशारा दे दिया तुमने........

पतंगा वो शमा के प्यार में, फिर आज जल बैठा,

वो देखो आज तो सूरज भी, पश्चिम से निकल बैठा,

तेरी आँखों का काजल है, या फिर काला कोई जादू,

बदलना चाह था तुझको, कि मैं खुद ही बदल बैठा॥


तेरे लफ्जों की बारिश में, मैं खुद खामोश हो बैठा,

तेरी जुल्फों के साए में, मैं खुद के होश खो बैठा,

कि क्यों तुम यूँ चले आते हो, ख्वाबों और ख्यालों में,

तुम्हे ही सोचता रहता हूँ, अपनी सोच खो बैठा॥


तुम्हारे साथ होता हूँ , तो खुद को भूल जाता हूँ,

तुन्हारी ही हँसी को देखकर, मैं मुस्कुराता हूँ,

कि क्यों तुम छोड़ जाते हो, हमें यादों के साए में,

शमा यादों की तेरी मैं, खुद जलकर जलाता हूँ॥


मेरे हर लफ्ज को फिर से, सहारा दे दिया तुमने,

फँसे थे हम तो साहिल में, किनारा दे दिया तुमने,

कि देखो आज फिर से ये कलम , उत्साह से चल दी,

चलो जो आज शब्दों को, इशारा दे दिया तुमने॥



Thursday, October 22, 2009

ख्वाब..................


आज उसकी एक हँसी से,
प्यार जब रुखसत हुआ,
उस बाबरी का बाबरापन,
न जाने कब मेरी ताकत हुआ॥

बंदिशें हमने लगाई थी तो,
इस दिल पर बहुत,
इश्क उनसे ऐ खुदा,
हमको न जाने कब हुआ॥

जिसकी बातों से हमें,
उलझन सी होती थी कभी,
आज उसकी हर अदा,
हर बात का कायल हुआ॥

कहते तो हैं कुछ शख्स ये,
क़ि प्यार एक इल्जाम है,
पर आज इस इल्जाम में,
मैं फक्र से शामिल हुआ॥

प्यार का पैगाम हम,
देने ही वाले थे मगर,
ख्वाब था वो रात का,
और ख्वाब कब हासिल हुआ॥



Monday, July 13, 2009

कोई मुझको ये बतला दो.........


कोई मुझको ये बतला दो।
मन में दीप जलाऊँ कैसे ,
जब वहीँ मुझे अंधियार मिले।
आशा की किरण जगाऊँ कैसे,
हर जीत में जब एक हार मिले।


जीवन के संघर्षों से तो,
काँटों पर चलना सीख लिया।
पर अगला कदम बढाऊँ कैसे,
जब मंजिल का धुंधला सार मिले॥


जब अपनी खुशियों को बांटा था,
एक भीड़ मिली थी तब मुझको।
अब अपने गम बतलाऊँ कैसे,
जब तन्हा सब संसार मिले॥


मन में उठती है एक पीर कभी,
कुछ प्रश्नों की हुंकारों से।
पर उनको मैं सुलझाऊं कैसे,
जब प्रश्नों का अम्बार मिले॥


जीवन के कोरे कागज पर,
लिखना तो मैंने सीख लिया।
पर अब ये कलम उठाऊँ कैसे,
जब न शब्द मिले, न सार मिले॥


सावन की रिमझिम सी बारिश,
मुझको भी अच्छी लगती है।
पर अब सावन बरसाऊँ कैसे,
जब पतझड़ ही हर बार मिले॥